विकास के साथ विरासत को बचाना भी जरूरी
आधुनिकीकरण की दौड़ में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को नजरअंदाज करना किसी शहर की पहचान के लिए घातक हो सकता है।

किसी भी शहर की पहचान सिर्फ उसकी सड़कों और इमारतों से नहीं, बल्कि उसके इतिहास और स्थापत्य विरासत से भी बनती है। जयपुर जैसे शहर के लिए यह बात और भी सटीक बैठती है, जहां हर गली, हर हवेली अपने भीतर एक कहानी समेटे हुए है।
लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण के दबाव में कई पुरानी इमारतें या तो उपेक्षा का शिकार हो रही हैं, या फिर आधुनिक निर्माण के नाम पर उनकी मूल संरचना से छेड़छाड़ हो रही है। निजी स्वामित्व वाली हेरिटेज इमारतों के मामले में यह समस्या और गंभीर है, जहां रखरखाव की लागत मालिकों पर भारी पड़ती है।
एक बार गिरा दी गई विरासत, दोबारा नहीं बनाई जा सकती — चाहे कितना भी पैसा खर्च कर लिया जाए।
इसका समाधान सिर्फ प्रतिबंध लगाने में नहीं, बल्कि प्रोत्साहन देने में है। अगर सरकार हेरिटेज भवनों के मालिकों को रखरखाव के लिए वित्तीय या कर संबंधी छूट दे, तो उन्हें गिराने के बजाय संरक्षित रखना एक व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।
विकास और विरासत को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय, हमें यह समझना होगा कि एक जीवंत ऐतिहासिक शहर की पहचान ही पर्यटन, रोजगार और सांस्कृतिक गौरव का सबसे बड़ा स्रोत बन सकती है — बशर्ते हम इसे समय रहते संभाल लें।
लेख पत्र संवाददाता
स्टाफ रिपोर्टर — लेख पत्र
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